बिश्नोई समाज 29‌ नियम : चोदहवां नियम ( निंदा ) भावार्थ सहित

बिश्नोई समाज 29‌ नियम : चोदहवां नियम ( निंदा ) भावार्थ सहित 

निंदा नहीं करना : 29‌ नियम


निंदा नहीं करना : दूसरों की निंदा नहीं करना चाहिए। अपने अवगुणों को छिपाकर दूसरों के अवगुणों को प्रकट करना ही सामान्य रूप से निंदा करना कहलाता है। निंदक लोगों का यह कर्तव्य कर्म ही हो जाता है कि वह दूसरों के गुणों को छिपाकर केवल उनके अवगुणों का ही चिंतन मनन करता रहता है। इसके उसके दुर्गण मिट तो नहीं जाते किन्तु व्यक्ति जैसा चिंतन करता है वह स्वभाव में उसके आ जाता है, वैसा ही जीवन उसका बन जाता है।
"परनिंदा पापा सिरै भूल उठावै भार" दूसरों की निंदा करना यह शिरोमणी पाप है। मूर्ख लोग इस पाप के बोझ को उठाकर वैसे ही भार मरते हैं।
"नींदक नेड़े राखिये आँगन कुटी छपाय।
बिन पाणी साबुणा मेल धूपे धुपजाय।"
निंदक मेरा मती मरो वे तो बड़ा सपूत,
मोह बैठावै सुरग में आप भूत का भूत।"
"जपो विष्णु निंदा न करणी।" दूसरों की निंदा करने में भी कुछ रस जरूर आता है। उस रस की प्राप्ति के चक्कर में अनेक प्रकार की कलह लड़ाई-झगड़े इसी के बदौलत देखे गये हैं। कभी-कभी रस में नीरसता आ जाती है तथा समय को व्यर्थ में गमाने का तो यह निंदा रस बहुत बड़ा साधन ही है। इसीलिए जीवन में सदा सुख शांति रखना चाहते हैं तथा दूसरों को भी सुख देने वाला पुण्य कर्म करना चाहते हैं तो परायी निंदा कभी न करें।
यदि कुछ कहने की हिम्मत हो तो अपनी ही निंदा करें, अपने ही दुर्गुणों को प्रकट करके उनसे छूटने का उपाय करें यही निंदा न करने का फल है। किसी कवि ने निंदक लोगों पर अपना रोष प्रकट किया है।
यथा
---- छप्पय---
जीवो राज सुराय, जीवो नर पर उपकारी।
जीवो जगदातार जीवो पतिवरता नारी।
जीवो सिद्ध अरू साधु, जीवो योगी निर्मोही,
जीवो जल थल के जीव,मरो संतन के द्रोही।
ईश्वर गिरि त्रिलोक में, और सकल आनंद करो।
जो संतन की निंदा करे, तिन के सिर विद्युत परो।




साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 





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