Tuesday, April 14, 2020

The 29 tenets of Bishnoism || बिश्नोई समाज के 29 धर्म नियम

The 29 tenets of Bishnoism 

  1. Observe a 30 day state of ritual impurity after child's birth and keep mother and child away from household activities.
  2. Observe a 5 day segregation while a woman is in her menses.
  3. Bathe daily in the morning before sunrise.
  4. Obey the ideal rules of life: modesty, patience or satisfactions, cleanliness.
  5. Pray twice everyday (morning and evening).
  6. Eulogise God, Vishnu, in the evening (Aarti)
  7. Perform Yajna (Havan) with the feelings of welfare devotion and love.
  8. Use filtered water, milk and cleaned firewood.
  9. Speak pure words in all sincerity.
  10. Practice forgiveness from the heart.
  11. Be merciful with sincerity.
  12. Do not steal nor harbour any intention to do it.
  13. Do not condemn or criticize.
  14. Do not lie.
  15. Do not indulge in dispute/debate.
  16. Fast on Amavasya.
  17. Worship and recite Lord Vishnu in adoration.
  18. Be merciful to all living beings and love them.
  19. Do not cut green trees, save the environment.
  20. Crush lust, anger, greed and attachment.
  21. Cook your food by yourself.
  22. Provide shelters for abandoned animals to avoid them from being slaughtered in abattoirs.
  23. Do not sterilise bulls.
  24. Do not use or trade opium.
  25. Do not smoke or use tobacco or its products.
  26. Do not take bhang or hemp.
  27. Do not drink alcohol/liquor.
  28. Do not eat meat, always remain purely vegetarian.
  29. Do not use violet blue colour extracted from the indigo plant.



Source: www.bishnoism.com (BISHNOI RK) 

Monday, April 13, 2020

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty ninth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   ninth rule of Bishnoi society. 



इस नियम द्वारा स्पष्टतया नीला वस्त्र धारण करना बिश्नोई के लिए सर्वथा निषेध किया है क्योंकि स्वभाव से जो सफेद वस्त्र हैं उसको नीले रंग से रंगा जाता है वह रंग ही मूलतः अशुद्ध होता है। इसकी उत्पत्ति तथा रंगाई दोनों ही अपवित्रता से होती है ऐसीशास्त्रों में मान्यता है। इसलिए स्मृति ग्रंथों में नीले वस्त्र धारण निषेध किया है- यथा स्नानं दानं जपो होम:, स्वाध्याय पितृ तर्पणम्। पंचयज्ञा वृथा तस्य नीली वस्त्रस्य धारणात् । नीले वस्त्रों को पहनकरयदि कोई नित्य- प्रति स्नान करे, सुपात्र को दान दें, सायं प्रातःकाल हवन करें या स्वाध्याय अतिथि सेवा आदि शुभ कर्म करें तो भी उन शुभ कर्मों का फल नष्ट हो जाता है तथा अन्य भी बहुत से प्रमाण श्रुति शास्त्रों में नीले वस्त्र निषेध संबंध में दिए हैं। बाल्मीकीय रामायण में अयोध्या नरेश त्रुशंकु की कथा आती है त्रिशंकु प्रथम तो अपने कुलगुरु के पास जाकर सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा प्रकट करता है जब वशिष्ठ जी मना कर देते हैं तो वशिष्ठ पुत्रों के पास जाकर निवेदन करता है तो वशिष्ठ पुत्र त्रिशंकु को इस प्रकार से शाप देते हैं कि वह चाण्डाल हो जाता है। "अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चाण्डालतां गतः, नील वस्त्रों नील पुरुषो ध्वस्त मूर्धज:! चित्य माल्यांग रागश्च, आयसा भरणोभवत् । तदन्नतर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गए। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रूक्षता आ गयी। शिर के बाल छोटे-छोटे हो गये।सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथा स्नान लोहे के गहने
पड़गए। इसलिए नीले वस्त्र पहनना चाण्डाल का लक्षण होता है चाण्डाल राक्षस लोग ही इस रंग
को पसंद करते हैं क्योंकि जैसी जिसकी भावना होती है वह बाह्य परिधान भी वैसा ही ग्रहण करेगा। बिश्नोईयों को तो चाण्डालता से निवृतकरके देव तुल्य बनाया था इसीलिए सफेद या अन्यरंग नीले को छोड़कर पहनने की आज्ञा दी थी। क्योंकि वस्त्रों का प्रभाव भी मन बुद्धि शरीर
स्वभाव पर बहुत ज्यादा पड़ता है। सभी की अपनी-अपनी ड्रेस(परिधान) होता है। उससे समाज पर प्रभाव विशेष पड़ता है। सेना, वकील, जज, भक्त, साधु, संन्यासी इन्हीं की अपनी-अपनी पोषाकें हैं
जिससे भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। यदि आप नीले वस्त्र धारण करेंगे तो आपके अंदर चांडालता, राक्षस, दुष्टपना अवश्य ही आयेगा। और वही आप यदि भक्त, साधु, सज्जन पुरुष का सौम्य शुभ्र, पीत या लाल वर्ण के कपड़े पहनेंगे तो आपका प्रभाव भावनायें अति उत्तम होगी। इसीलिए राक्षसी परिधान त्याग करके भक्त का यह सफेद वस्त्र पहनना गुरु जी ने बतलाया था।
कुछ वैज्ञानिक लोग नीले वस्त्र में दोष बतलाते हुए कहते हैं कि यह हिन्दुस्तान गर्म देश है इसमे
गर्मी अधिक पड़ने का कारण सूर्य की किरणें यहां पर सीधी पड़ती हैं और वे किरणें नीले रंग की ओर आकर्षित ज्यादा ही होती हैं। सूर्य की किरणों से विपरीत रंग होता होता है जिससे सूर्य की किरणों को नीला वस्त्र खींचता है। जिससे गर्मी ज्यादा लगेगी। नीले वस्त्र से छनकर आयी हुई गर्मी स्वास्थ्य के लिए अति हानीकारक होती है तथा सफेद वस्त्र पर सूर्य की किरणें अपना प्रभाव नहीं डाल सकती वस्त्र पर पड़ते ही फिसल जाएगी शरीर तक अपना प्रभाव नहीं जमा पाएगी और यदि यत्किचिंत जमाती है तो भी शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक ही होती है। इसीलिए सफेद वस्त्र ही धारण करना चाहिए नील वस्त्र सभी दृष्टियों से हानीकारक सिद्ध हुआ है। नीले या काले वस्त्र में मेल गंदगी अपवित्रता का साम्राज्य होता है। क्योंकि वहआँखो से तो दिखाई नहीं पड़ता है सफेद वस्त्र में मेल छिपाने की गुंजाइश जरा भी नहीं होती।सफेद वस्त्रों से भक्त की पहचान होती है और नीले वस्त्रों से चाण्डाल दृष्टता की पहचान होती है। इसीलिए जम्भदेव जी ने जब बिश्नोई बनाए थे तब सभी के लिए यह नियम लागू करते हुए बताया था कि अब आप लोग भक्त सज्जन हो चुके हैं आपकी पहचान सफेद वस्त्रों द्वारा होगी। आप लोग हृदय की कालुष्यता त्याग चुके हैं तो अब
वस्त्रों की कालुष्यता भी त्याग दीजिए। यही नील वस्त्र त्याग रूपी नियम को बताने का उद्देश्य था और यह नियम सर्वथा शास्त्र सम्मत, वैज्ञानिकों की कसौटी पर खरा उतरने वाला है यदि इसके संबंध में संदेह होता है तो अवश्य ही विचार करके देखिए समाधान मिलेगा।

विशेष:- इस प्रकार से उन्नतीस नियमों की व्याख्या पूर्ण होती है तथा उन्नतीस नियमों के अंत में एक दोहा भी कहा है जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं--

उन्नतीस धर्म की आखड़ी, हिरदै धरियो जोय।
जाम्भे जी किरपा करी, नाम बिश्नोई होय॥



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty eighteenth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   eighteenth rule of Bishnoi society. 


मनुष्य को कभी शराब नहीं पीना चाहिए। यदि जिसने भी शराब का सेवन कर लिया तो समझौ फिर उसने मांस भी खा लिया इसलिए मद्य मांस दोनों को एक ही नियम के अंतर्गत रखे गए हैं। इन दोनों में से एक कर्म कर लिया तो फिर दूसरा भी करने में कोई संकोच नहीं होगा। शराब पीने में अनेक अवगुण शास्त्रकारों ने तथा महापुरुषों ने बताए है- चित्ते भ्रान्तिजयिते मद्यपानाद् भ्रांते चित्ते पाप चय्-र्यमुपैति । पापं कृत्वा दुर्गतिं यान्ति,मिढास्तस्मान्मद्यं नैवपेयं नैव पेयम्।।रत्नाकर।। मद्यपान करने से चित्त में भ्रांति उत्पन्न हो जाती है तथा भ्रांत चित्त से पाप कर्म
ही हो सकते हैं और पापों को करके तो दुर्गति को प्राप्त होता है इसलिए हे मूढ़ ! मद्यपान न करो, न करो। यही सलाह जम्भेश्वर भगवान ने दी थी। क्योंकि सभी अनर्थों का मूल यह शराब ही है। इस अनर्थ के पीछे सभी पाप, अनर्थ चले आते हैं। ऐसा हम लोग व्यवहार में देखते भी हैं। तथा च मद्यपान के और भी अवगुण है। द्यूतं च मांसं च सुरा च वैश्या, पापादि चौर्य परदार सेवा। एतानि सप्त व्यसनानि लोके, पापाधिके पुन्सि सदा भवन्ति ।। सुरापान करने से अन्य व्यसन जैसे जुआ खेलना, मांस खाना, वैश्या गमन करना, चोरी करना, परस्त्री की सेवा करना तथा पापों की अधिकता हो जाना इत्यादि होते हैं। जो मानव को पतित कर देते है। इसलिए मानवता की रक्षा के लिए व्यसनों के मूलरूप शराब को ही काट डालना चाहिए। यदि इस मूल को पानी सिंचते रहे तो फिर कभी भी मानव व्यसनों से छुट्टी पा सकेगा। अपना तथा अपने संबंधियों का जीवन बरबाद कर डालेगा। शराब पीने के पश्चात मनुष्य सुध-बुद्ध खो बैठता है। उसे किसी प्रकार की मर्यादा का भानही नहीं रहता है ऐसे समय में वह कुछ भी कुकर्मकर सकता है। ऐसी कामना करने से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब तक जो भी भयंकर अनर्थ हुए हैंवे सभी इसी मद्यपान के बदौलत ही हुए हैं, सभी झगड़े झंझटों का मूल यह गंदा पानी ही है। इसीलिए ऐसा विचार करके इसका त्याग करें तथा करवायें इस जीवन को स्वर्गमय बनाए तथा बनवायें इससे बढ़कर और कोई जीवन का लाभ नहीं होगा। मांस नहीं खाना इसकी व्याख्या तो जीव दया पालणी के अंतर्गत ही हो गई है पुनः व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का सताईसवां नियम (भांग) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty seven rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का सताईसवां  नियम (भांग) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   seven rule of Bishnoi society. 


भांग कदापि नहीं पीना चाहिए। भांग भी एक प्रकार का जहर है। शरीर को धीरे-धीरे काटता है। भांग पीने वाले को तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ कि मोटा हो रहा हूँ। किन्तु वास्तविकता से वह बहुत दूर होता है। शिवजी का नाम लेकर साधना भजन करने वाले
भी भांग को पवित्र मानकर पीते हैं। वहाँ पर नाम साधना कालेते हैं और भांग के नशे में धुत रहते हैं। इसी प्रकार से अपने जीवन को बरबाद करते देखे गए हैं। जीवन की वास्तविकता को नशा थोड़ी देर के लिए भूला सकता हैं जिसका यह तात्पर्य तो नहीं होता कि आप सदा के लिए ही दुःखों से छूट गए हैं। शिवजी की बराबरी करना तो ढोंग मात्र ही है। केवल तम्बाकू भांग से
शिवजी नहीं बना जा सकता। उसके लिए शिव जैसी तपस्या करनी होगी। भांग पीने वाले अर्ध विक्षिप्त तो होते ही हैं कभी-कभी उन पर अधिक भांग सेवन से पूर्णतया पागलपन आ जाता है। ऐसे समय में जीवनसे भी हाथ धो बैठते हैं। "भांग भखंत ध्यान ज्ञान खोवंत, यम दरबार ते प्राण रोवन्त" गोरखवाणी" भांग पीने से ज्ञान ध्यान, नष्ट हो जाते हैं तथा इस जीवन में दुःख उठाते हुए मृत्यु पर यमराज के दूतोंद्वारा मार पड़ने पर फिर प्राण रोयेंगे। इसलिए कभी भी भांग
नहीं पिनी चाहिए।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty sixth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty  sixth rule of Bishnoi society. 


खाने पीने सूंघने के रूप में तम्बाकू का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी भयंकर हानीकारक वस्तु को गधे भी नहीं खाते किन्तु वाह रे मानव ! तूने इसका कई प्रकार से प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया है। आज तक तो इतिहास साक्षी है कि कोईभी तम्बाकू का सेवन करने वाला न तो स्वयं सुख शांति को प्राप्त हुआ है और न ही अपने पड़ोसी को सुख शांतिपूर्वक रहने दिया है। सर्वप्रथमतो तम्बाकू से अपने मन बुद्धि तथा शरीर को स्वयं कमजोर करता है और बाद में तम्बाकू की दुर्गंध से समीपस्त जनों को भी दूषित कर देताहै। प्राचीनकाल में तो गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इस महान कोढ से अवगत करवाकर सदा ही इससे अपनी रक्षा करने का उपाय बतलाया था। सभी को पाहल देकर प्रतिज्ञा करवायी थी। धीरे-धीरे समय पाकर आज इसने पुनः भयंकर रूप धारण कर लिया है। इससे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक, डॉक्टर,मनीषी बहुत ही चिंतित हो चुके हैं। नयी-नयी कानूनें बनवातेहैं, चेतावनी देते हैं, कि यह नशा ही मानवता की मौत का = संदेश है। इसीप्रकार यदि सभी लोग इस नशे के चक्कर में पड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जिस दिन मानवता नष्ट हो जाएगी। ये बने हुए एटम बम तो न जाने कब टूटेगे। इससे पहले ही यह तम्बाकू आदि का नशा मानवता को नष्ट कर देगा। इसलिए आजकल कई देशों में सामूहिक रूप से लोग नशे को छोड़ रहे हैं। ऐसा ही दुःख जाहिर किसी विद्वान ने किया है। उन्हीं के शब्दों में- "तम्बाकू और इंसान दोनों एक दूसरे को खाते हैं" बस यों ही खाया था मीठा पान और अब ? अब तो तम्बाकू सिगरेट की आदत छूटती ही नहीं। लेकिन मात्र लाचारी जाहिर करने से इस सच

को झूठलाया नहीं जा सकता कि स्वाद के नाम पर लिया गया तम्बाकू या तनाव घटाने के बहाने पी गयी सिगरेट के हर पैकेट के साथ आप जिंदगी को उस चौराहे की ओर ढकेल देते हैं, जहाँ से हर रास्ता आपको मौत के करीबले जाता है।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का पच्चीसवां नियम (अमल) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty fifth rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का पच्चीसवां नियम (अमल) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty  fifth rule of Bishnoi society


अफीम नहीं खाना चाहिए। अफीम एक भयंकर नशीला पदार्थ है इसके वशीभूत मानव जल्दी ही हो जाता है। दो-चार दिन ही लगातार खाते रहने से फिर कभी भी खाये बिना नहीं रह सकता है। शरीर के अंग-प्रत्यंग में अतिशीघ्रता से अपना असर जमा लेती है। जैसा अमल स्वयं काले रंग का होता है,वैसा ही खाने वाले का बना देती है। दिनोदिन इससे शरीर कमजोर होता चला जाता है और अफीम की पकड़ मजबूत होती चली जाती है। अफीम खाने वाले के सभी नियम धर्म शुभ कर्म छूट जाते हैं। अफीम मनुष्य को शारीरिक रूप से कमजोर करने साथ आर्थिक संकट में भी डाल देता है। इसमें यदि देखा जाए तो अवगुण तो असंख्य नजर आएँगे किन्तु गुण एक भी नहीं है। मानव जब धर्म नियम की मर्यादा एक बार भी भूलकर तोङ देता है तो फिर इस प्रकार की बरबादी में फँस जाता है , फिर निकलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कभी भी भूलकर भी अफीम नहीं खाना चाहिए और न ही छोटे बच्चों को खिलाकर अफीम खाने की आदत ही डालनी चाहिए। किसी कवि ने अफीम खाने वाले की धर्मपत्नी के दुःख दर्द को कविता में कितना सुंदर साकार किया है-- कोसत हो उस दोस्त को,जिन पोसत पीव न पीय को सिखायो। टूटी सी खाट पै ऐसो परो, मानो सासनै पूत को आजहि जायो। कर्म विकर्म भए पिय के सब, पोसत पीकर दुष्ट कहायो। बल बीरज नाश भया सगरो बपु, अंत समय पिय को इन गायो।
अफीम खाने वाला जीते जी ही इस दिव्य शरीर को नरकमय बना लेता है। मृत्यु पर भी वह शुभ कर्म न कर सकने गए कारण नरक में ही पड़ता है। इसलिए सभी को सचेत रहकर इस भयंकर कोढ से सदा ही अपनी रक्षा करनी चाहिए।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का चौबिसवां नियम (बैल बधिया) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty fourth rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का चौबिसवां नियम (बैल बधिया) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty fourth rule of Bishnoi society

बैल को बधिया न तो स्वयं करे और नही दूसरों को प्रेरणा देकर करवायें। जब बछड़ा हल चलाने लायक बड़ा हो जाता है तो लोग उसे कर देते हैं या करवा लेते हैं फिर उसे हल गाड़ी में चलाने के काम में लिया जाता है। यदि ऐसा न करें तो गाड़ी हल चलता नहीं है, काफी परेशान करता है। जब उसे नपुसंक  बनाया जाता है तो वह दृश्य अति करुणामय तथा कष्टदायक होता है। जो पीड़ा उस बछड़े को सहन करनी होती है उसकाकोई आर-पार नहीं हैं। उस समय की छटपटाहट दर्द और चिल्लाना देखने वाले कठोर हृदय मानव को भीपिघला देता है। इसलिए गुरु जम्भेश्वर भगवान ने बिश्नोईयों के लिए यह विशेष धर्म नियम बनाया कि बैल कॅ तपुंसक तुम लोग कभी नहीं करवाना, उस पाप का भागी कभी मत बनना। और न ही अपनी घर की गऊ के बछड़े को हल-गाड़ी ही चलाना औरन ही बधिया करवाना। जो तपुंसक हो चुके हैं, किसी द्वारा कर दिये गये हैं उन्हें खरीदकर अपना कार्य कर लेना। यह नियम भी विशेष रूप से किसानों पर ही लागू होता है क्योंकि व्यापारी या अन्य कार्यकर्ता के लिए ऐसी नौबत ही नहीं आती । यदि आती है तो फिर इस नियम का पालन अवश्यमेव करना चाहिए। यह नियम भी दया की वृद्धि करके जीव की पीड़ा को हरण करने वाला है। इस नियम का पालन भी बिश्नोईयों द्वारा दृढ़ता से होता आ रहा हैं।



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी