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बिश्नोई समाज के 29 नियमों में पहला नियम (तीस दिन सूतक रखना) भावार्थ सहित

 

  बिश्नोई समाज के 29 नियमों में पहला नियम (तीस दिन सूतक रखना) भावार्थ सहित  

बिश्नोई समाज का पहला नियम (तीस दिन सूतक रखना) भावार्थ सहित || Explaintion of the first rule of Bishnoi Community

तीस दिन सूतक रखना : तीस दिन तक प्रसूता स्त्री को गृह कार्य से पृथक रखना चाहिये। उन्नतीस नियमो में यह पहला नियम है। मानव के शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की यही नींव है। यहीं से माानव जीवन प्रारम्भ होता है। 

यदि यह प्रारम्भिक काल ही बिगड़ जायेगा तो फिर आगे मानवता का विकास कैसे हो सकेगा। शायद दुनियां में प्रथम बार ही जम्भेश्वरजी ने यह तीस दिन सूतक का नियम बतलाया है। वैसे सूतक मानते तो सभी हैं किन्तु तीस दिन का किसी भी समाज में नहीं मानते और न ही इस रहस्य को जानते ही हैं। 

विश्नोईयों के लिए बालक जन्म का सूतक तो तीस दिन का बतलाया तथा मृत्यु का सूतक तीन ही दिन का बतलाया है। इनमें कुछ रहस्य छुपा हुआ है, इस पर विचार करके देखना चाहिये। जब बालक दस महीने तक गर्भवास में निवास करता है, पश्चात समय आने पर जन्म लेता है उस समय माता व बालक दोनों ही अपवित्र अवस्था में हो जाते हैं। शरीर गर्भ से बाहर आया है जिससे गर्भ के सभी भाग वह साथ में लेकर आया है तथा उसकी माता के भी शरीर के अन्दर कमजोरी विकृति पैदा हो गयी होती है। इन दोनों को स्वस्थ तथा पवित्र होने में भी समय चाहिये, समय पाकर ही पवित्रता आ सकती है। इसीलिये तीस दिनों का समय रखा गया है जो सूतक रूप में बताया है तथा तीस दिन पूर्ण हो जाने पर ही संस्कार करके उसे विश्नोई बनाया जाता है तथा मृत्यु का सूतक तीन ही दिन का बताया है क्योंकि वहां पर तो कुछ शेष बचता नहीं है। जीव तीन दिन के पश्चात चला ही जाता है और शरीर तो उसी दिन ही जमीन को समर्पित हो जाता है फिर इतना लम्बा पातक किसके लिए रखा जावे। इसीलिए तीसरे दिन ही जीव की समारोहपूर्वक विदाई तथा मिलन हो जाता है उसी दिन पाहल हवन द्वारा संस्कार कर दिया जाता है। ‘‘आज मूवा कल दूसर दिन है जो कुछ सरै तौ सारी’’ (शब्दवाणी)। दूसरी बात यह है कि तीस दिन तक प्रसूता स्त्री को गृहकार्य से पृथक इसीलिए रखा जाता है कि उसे पूर्णतया विश्राम चाहिये क्योंकि बच्चा पैदा होने से उसके शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाती है। उस कमजोरी की पूर्ति के लिए एक महीना पूर्णतया विश्राम तथा साथ में पौष्टिक भोजन भी दिया जाना आवश्यक है और ऐसा करते भी हैं। इसमें दो कारण हैं। प्रथम तो यह है कि बच्चे की माता का शरीर पुनः क्षति की पूर्ति कर लेगा। यदि ऐसा न हो सकेगा तो कमजोर शरीर से न तो कुछ कार्य ही हो सकेगा और न ही शरीर स्वस्थ ही रह सकेगा। अनेकानेक बीमारियां शरीर को पकड़ लेगी, जिससे कभी भी अकाल मृत्यु हो सकती है। मातृशक्ति तो खेती की तरह होती है, उस खेती को सुधारा जायेगा, उसे खाद पानी आदि देते रहोगे तो वह नित नयी फसल देती रहेगी अन्यथा खेती अच्छा फल नहीं दे सकेगी। दूसरा लाभ यह होता है कि नवजात शिशु को अपनी मां का दूध भरपूर मात्रा में मिल सकेगा। उस समय का अपनी ही माता का पिया हुआ अमृतमय दुग्ध भविष्य में शरीर, मन तथा बुद्धि निर्माण में सहायक होता है। यदि ऊगते हुए वृक्ष को ही पूर्णतया खाद पानी नहीं मिलेगा तो वह कभी भी विशाल वृक्ष नहीं बन सकेगा। विश्नोईयों में यह परम्परा प्राचीनकाल से ही इस नियम के बदौलत चलती आ रही है जिससे सुन्दर बलिष्ठ जवान पैदा होते आये हैं। अन्य लोगों में से इनकी पहचान हो जाती थी। आजकल इन नियमों में कुछ ढ़ील हो जाने से वह बात अब नहीं दिखाई देती।

29 नियम - बिश्नोई समाज | आइए जाने बिश्नोई समाज के 29 नियम

  29 नियम 



जांभोजी ने प्रत्येक जाति, वर्ग और वर्ण के महिला-पुरूष को आत्मोत्थान का मार्ग दिखाया तथा नीच और पतित को ऊँचा उठाया था। बिश्नोई पंथ प्रवृति के साथ निवृति- साधन का मार्ग है, जिसकी पुष्टि बिश्नोई समाज के 29 नियमों से भी होती है। 


बिश्नोई समाज के 29 नियम 


1.तीस दिन सूतक रखना।
2 .पांच दिन का रजस्वला रखना।
3. प्रातः काल स्नान करना।
4. शील , सन्तोष व शुद्धि रखना।
5. प्रातः सायं सन्ध्या करना।
6. सांझ आरती, विष्णु गुन गाना।
7. प्रातः काल हवन करना।
8. पानी छानकर पीयें व वाणी षुद्ध बोलें।
9. ईंधन बीनकर व दूध छानकर लें।
10. क्षमा - सहनषीलता रखें।
11. दया - नम्रभाव से रहें।
12. चोरी नहीं करनी।
13. निन्दा नहीं करनी।
14. झूठ नहीं बोलना।
15. वाद-विवाद नहीं करना।
16. अमावस्या का व्रत रखना।
17. भजन विष्णु का करना।
18. प्राणी मात्र पर दया रखना।
19. हरे वृक्ष नहीं काटना।
20. अजर को जरना।
21. अपने हाथ से रसोई पकाना।
22.थाट अमर रखना।
23.बैल को बधिया न करना।
24. अमल नहीं खाना।
25. तंमाखू नहीं खाना व पीना।
26.भांग नहीं पीना।
27.मद्यपान नहीं करना।
28.माँस नहीं खाना।
29.नीले रंग का वस्त्र नहीं पहनना

लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे | रामस्वरुप बिश्नोई | Bishnoism


 बिश्नोई समाज के 29वें नियम ( लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे ) पर आधारित आलेख।

लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे | रामस्वरुप बिश्नोई | Bishnoism
लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे.




लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे


लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे। लीला - सृष्टि - जगत - संसार तथा सांसारिक इच्छाओं और वस्तु वासनाओं के बंधन । न लावै अंग-कभी अंगीकार न करे - निर्लिप्त रहें। देखते दूर ही त्यागे - सांसारिक इच्छाओं और वस्तु वासनाओं के माया मोह को, दूर से ही त्याग करे। अर्थात् इस प्रकार इस नियम का अर्थ यह हुआ |"मनुष्य को सांसारिक इच्छाओं और वस्तु भावनाओं से रहित व सांसारिक माया मोह के बंधनों से मुक्त रहकर संसार को ही सब कुछ व नित्य समझ कर- उसे अंगीकार न करना। संसार में वैराग्य भाव से रहकर निष्काम भाव से कर्म कर व परोपकार करते हुये सदैव चिदानन्द अवस्था को प्राप्त करना।"


भगवान जम्भेश्वर ने सृष्टि - जगत संसार को "लील" कहा है और जो यहाँ जगत में घटित हो रहा है उसे भगवान की लीला मानते हैं। लीला का अर्थ होता है खेल। मनुष्य हर खेल में आनन्द लेता है क्योंकि खेल आनन्द प्राप्ति हेतु ही होता है। खेल में हानि लाभ की विशेष बात नहीं होती है। इसलिए मनुष्य इस में गंभीर नहीं होता है और आनन्द लेने के लिए खेलता इस तरह सृष्टि के खेल से जो आनन्द प्राप्त होता है उसको भगवान जंभेश्वर ने "लालू" कहा है और जो इस लीला में आनन्द ले उस भगवान को लीलंग' कहा है - अर्थात् परमात्मा लीलंग है। अवतार रूप में जब-जब परमात्मा जगत में आये -तो उनके जगत में हुए कार्यों को - भारत में हर वर्ष लीला के नाम से जैसे रामलीला, कृष्णलीला आदि के नाटक का खेल रचकर - हम लोग उसमें आनन्द लेते हैं। भगवान जम्भेश्वर के दर्शन शास्त्र के अनुसार इस संसार में जो हो रहा है वह एक भगवान की लीला है खेल है। इसलिए मनुष्य को संसार को एक लीला खेल समझते हुए इसमें गम्भीर नहीं हो जाना चाहिए।

इस लीला में- खेल में उसे आनन्द लेना चाहिए मनुष्य इस संसार में आनन्द चित्त कब हो सकता है जब वह इस संसार को भगवान की लीला-खेल समझे। खेल मनुष्य कब समझ सकता है? जब वह सांसारिक माया मोह के बन्धनों से मुक्त रहे, अर्थात् बंधन रहित रहे। इस बंधन रहित होने के भाव को ही वैराग्य कहा जाता है अर्थात् सांसारिक विषय वासनाओं और इच्छाओं से उदासीन होना ही वैराग्य है। जब मनुष्य इस जगत में वैराग्य भाव से रहता है तो वह एक रस रहता हुआ आनन्द चित्त रहता है। इस निरपेक्ष भाव से रहने पर संसार की स्वाभाविक और प्राकृतिक घटनाओं के क्रम को भली भांति समझने पर दुःख में विचलित नहीं होता है और सुख में अहंकार वश वैभव प्रदर्शन नहीं करता है तथा वह धन और राजसी ठाठ बाट को उसकी वास्तविकता स्पष्ट समझते हुए उसे तुच्छ व क्षणिक समझकर उससे प्रभावित नहीं होता है। इसीलिये भगवान जम्भेश्वर ने इस नियम में इस लीला -- सृष्टि को समस्त व नित्य मानकर इसे अंगीकार न करने को कहा है। यह तभी हो सकता है जब मनुष्य इस संसार में वैराग्य भाव से संसारिक वस्तुओं व बंधनों से मुक्त होकर यहाँ रहे।

इस नियम में भगवान जम्भेश्वर ने *"लील"* शब्द का प्रयोग किया है। लील शब्द इस नियम का रहस्य भेद है। लील शब्द का वाणी में क्या अर्थ है? यह समझने पर फिर इस नियम के अर्थ को समझने में कठिनाई नहीं है परन्तु इसे पालन करने में जरूर कठिनाई आती है। जो निरन्तर अभ्यास व चैतन्य रहने से सरल हो सकती है। भगवान जम्भेश्वर ने अपनी शब्द वाणी में जहाँ-जहाँ शब्द लील-लील-लिंग का प्रयोग किया है। उसे किस अर्थ में प्रयोग किया है| उसी अर्थानुसार हमें इस नियम में प्रयोग लील शब्द को समझना चाहिये। उन्होंने अपने शब्द शुक्ल हंस की पंक्ति 55 में 'लील' शब्द का प्रयोग इस प्रकार किया है-

"कुण जाणै महे लीलपति" 67:55 अर्थात् कौन समझता है कि मैं इस लील-सृष्टि का सृजनहार व इसका पति-स्वामी हूँ।

भगवान जम्भेश्वर ने बादशाह सिकंदर लोधी के भेजे दूत के चार प्रश्नों के उत्तर में "अलील" शब्द का उपयोग किया है। यह सबदवाणी का शब्द संख्या 103 पर प्रश्न उत्तर के रूप में निम्नलिखित तरफ से है "कवण स मोमिण कवण स मांण

कवण पुरिष अछै रहिमांण

केणि पुरिष आ जिमी उपाय मुसलमान कहां थी आई? पुर्ण स मोमिण (सारंग) पाणी गाणं अलील पुरिष आ अछै रहिमांण अलख पुरिष आ जिमीं उपाय महमंद थी मुसलमान आई।"

103:1 से 8

अर्थात् भक्त कौन है? पूज्य कौन है? कौन पुरुष अच्छा दयालु है? किस पुरुष ने इस सृष्टि को उत्पन्न किया है? और मुसलमानी मत किससे चला है ?

पवन सुत हनुमान सबसे सच्चा सेवक व भक्त है और भगवान राम (सारंग पाणी) सबसे पूजनीय हैं। अलील-लील रहित सांसारिक बंधनों से अलिप्त अर्थात् संसारिक माया मोह के बंधनों से मुक्त वैराग्य भाव से रहने वाला पुरुष ही सबसे अच्छा दयालु है क्योंकि वही निष्काम भाव से कार्य करता हुआ परोपकार करता है। अलख-अलक्ष्य (सृष्टि रचने में भगवान का कोई लक्ष्य प्रयोजन नहीं है केवल अपनी लीला हित बनाई है)। भगवान ने इस सृष्टि को उत्पन्न किया है। मोहम्मद साहब से मुसलमानी मत चला है। अल्लाह द्वारा सीधा मुस्लिम धर्म नहीं चलाया गया है। नोट - मूल शब्द में सारंग शब्द प्रयोग में नहीं है क्योंकि पद्य में बहुत से शब्द अदृश्य कई बार मात्रा और छन्द आदि के क्रम को ध्यान में रखने के लिए किये जाते हैं।
भगवान जम्भेश्वर ने कलश पूजा मंत्र में भी अपनी ग्याहरवीं पंक्ति में 'अलील' शब्द को इस प्रकार प्रयोग किया है।

"अलील रूपी निरंजनो"। अर्थात् जो मनुष्य अलील संसार से अलिप्त - वैराग्य भाव रूपी हो जाता है वही साक्षात् भगवान बन जाता है, या इसका दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि संसार में सब कुछ लीला करते हुए भी परमात्मा इससे अलिप्त और निर्विकार है।

लील और अलील शब्दों का अर्थ उपरोक्त शब्दों में समझने के बाद लीलू शब्द के अर्थ को भी सबद वाणी में प्रयोग किए गए अर्थ के मुताबिक समझना आवश्यक है। भगवान जम्भेश्वर ने अपने शबद 12 की पंक्ति 13 व 14 में कहा है

"बिली की इंद्री संतोष न होयबा किसन चिरत विणी, काफरा न होयबा लीलू" अर्थात् हरि कृपा बिना बिल्ली कभी संतोष आवृत्ति की नहीं हो सकती। इसी प्रकार नास्तिक मनुष्य संसारिक बंधनों से जकड़ा होने के कारण कभी आनन्द चित्त (लीलू) नहीं हो सकता।

भगवान जम्भेश्वर ने अपने अन्य सबद संख्या 64 की पंक्ति 7 से 9 में लीलू तथा नील शब्द का प्रयोग किया है। यह किस प्रयोजनार्थ उपयोग किया है इसको और भली भांति समझ लेना चाहिए।

जा जा सैतान करै उफारौ तां तां महतक फलियौ नील मध्ये कुचील करिबा, साध संगीणीं थूलूं पोहप मध्ये परमला जोती,ज्यों सुरगमध्य लीलूं।

64:7 से अर्थात् जब जब दुष्ट लोग अहंकार कर नील मध्ये-संसार में कुकर्म करते हैं और साधुओं के साथ अर्थात् सज्जनों के साथ स्थूलता का व्यवहार कर उनको दु:ख देते हैं - तब तब ईश्वर का अवतार होता है है। जिस तरह फूल में स्वभावतः ही सुगन्ध होती है उसी तरह स्वर्ग में स्वभावतः ही आनन्द - (लीला) होता है।

इस शब्द में भगवान जम्भेश्वर ने नील मध्ये कह कर यह शब्द भी सृष्टि-संसार के लिए ही उपयोग किया है। भगवान जम्भेश्वर ने नील-लील-दोनों शब्द संसार-जगत-सृष्टि के लिए ही उपयोग किये हैं।

लील का अर्थ नीला रंग लेना बड़ी स्थूल बात है |जिसके लिए भगवान जम्भेश्वर ने स्वयं भी सावधान किया है। नीला रंग किसी अन्य धर्म विशेष का रंग नहीं है। नीला रंग किसी जीव हत्या या किसी बुरी वस्तु से नहीं बनता है। नीला रंग एक जामुन जैसे बड़े पेड़ के फलों से बनता है। इसमें कोई गंध नहीं होती है। नीला वस्त्र पहनने से स्वास्थ्य नियमों के अनुसार भी मनुष्य के स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। भगवान जम्भेश्वर का सारा उपदेश मनुष्य में सात्विक गुणों की प्रधानता उत्पन्न करने में है जिससे उसे जीवन-मुक्ति और मोक्ष मिल सकें। उन्होंने बाह्य वेष को तो एक आडम्बर व पाखण्ड बताया है। जो जोगी-जोगियों जैसे वेष तो रखते थे, परन्तु कर्म जोगियों जैसे नहीं थे। उनको उन्होंने स्पष्ट शब्दों में उनके इस पाखण्ड का खण्डन किया है। मनुष्य, जीवन में किस रंग के कपड़े पहनता है इस बात को उन्होंने बिल्कुल गौण माना है और इस सम्बन्ध में कहीं भी कोई कथन नहीं किया है। हाँ, जीवन में मोटा वस्त्र पहनना, जो रूखा-सूखा (कड़वा, मीठा) अपने घर में है उसे खाकर संतोष का जीवन सादगी से बिताने पर जरूर बल दिया है।

हरा रंग भी नीला और पीला रंग मिलाने से बनता ऐसे बहुत से अन्य रंग भी हैं जिनमें नीला रंग मिला करके दूसरा रंग बनाया जाता है। इसलिए बहुत से रंग इस नियम का स्थूल अर्थ मानने से निषेधित हो जाते हैं। भगवान जम्भेश्वर की शब्दवाणी में नीले वस्त्र का पहनना कहीं भी निषेध नहीं है। यह परम्परागत, दन्त कथा, अज्ञानता या अन्य धर्मावलम्बियों के प्रभाव में आने के कारण शायद हम मान बैठे हैं। इस नियम की जो सूक्ष्मता है- यह नियम जो जीवन मुक्त कराने में सहायक हो सकता है- यह नियम जो जीवन की विधि जानने में सहायक हो सकता है- यह नियम जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त करने में सहायक हो सकता है| ऐसे प्रयोजनशील व सारयुक्त नियम को इतना स्थूल अर्थ देकर हमने इस नियम की महत्वता को बिलकुल गंवा दिया है। इसलिए सब धार्मिक श्रद्धालुओं को, मुमुक्षओं को, बुद्धिजीवियों को, साधु-संतों को और साधारण लोगों को भी इस नियम को उपरोक्त लिखित व्याख्या के अनुसार गंभीरता से सोच समझकर जीवन में पालन करना चाहिए, जिससे यह नियम उनकी भक्ति में उनकी साधना में, उनके कर्म में सहायक बनकर उनको जीवन मुक्ति, जीने की युक्ति व मोक्ष को प्राप्त करने में सहायक हो सके।

नोट: यह लेख बिश्नोई समाज की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाले मासिक पत्रिका "अमर ज्योति" से लिया गई है. इस लेख को ब्लॉग पर प्रकाशित करने का एक मात्र उद्देश्य इस नियम की अन्य व्याख्याओं से इत्र दूसरे पहलु को जाम्भाणी पाठकों बताना मात्र है. 
अमर ज्योति पत्रिका ऑनलाइन पढ़ने के लिए क्लिक करें: अमर ज्योति पत्रिका

 

-रामस्वरूप बिश्नोई

एडवोकेट श्री गंगानगर (राज.)

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty ninth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (नील का प्रयोग न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   ninth rule of Bishnoi society. 

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   ninth rule of Bishnoi society.


// नील का प्रयोग न करें //


नील का प्रयोग न करें। इस नियम द्वारा स्पष्टतया नीला वस्त्र धारण करना बिश्नोई के लिए सर्वथा निषेध किया है क्योंकि स्वभाव से जो सफेद वस्त्र हैं उसको नीले रंग से रंगा जाता है वह रंग ही मूलतः अशुद्ध होता है। इसकी उत्पत्ति तथा रंगाई दोनों ही अपवित्रता से होती है ऐसीशास्त्रों में मान्यता है। इसलिए स्मृति ग्रंथों में नीले वस्त्र धारण निषेध किया है- यथा स्नानं दानं जपो होम:, स्वाध्याय पितृ तर्पणम्। पंचयज्ञा वृथा तस्य नीली वस्त्रस्य धारणात् । नीले वस्त्रों को पहनकरयदि कोई नित्य- प्रति स्नान करे, सुपात्र को दान दें, सायं प्रातःकाल हवन करें या स्वाध्याय अतिथि सेवा आदि शुभ कर्म करें तो भी उन शुभ कर्मों का फल नष्ट हो जाता है तथा अन्य भी बहुत से प्रमाण श्रुति शास्त्रों में नीले वस्त्र निषेध संबंध में दिए हैं। बाल्मीकीय रामायण में अयोध्या नरेश त्रुशंकु की कथा आती है त्रिशंकु प्रथम तो अपने कुलगुरु के पास जाकर सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा प्रकट करता है जब वशिष्ठ जी मना कर देते हैं तो वशिष्ठ पुत्रों के पास जाकर निवेदन करता है तो वशिष्ठ पुत्र त्रिशंकु को इस प्रकार से शाप देते हैं कि वह चाण्डाल हो जाता है। "अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चाण्डालतां गतः, नील वस्त्रों नील पुरुषो ध्वस्त मूर्धज:! चित्य माल्यांग रागश्च, आयसा भरणोभवत् । तदन्नतर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गए। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रूक्षता आ गयी। शिर के बाल छोटे-छोटे हो गये।सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथा स्नान लोहे के गहने

पड़गए। इसलिए नीले वस्त्र पहनना चाण्डाल का लक्षण होता है चाण्डाल राक्षस लोग ही इस रंग
को पसंद करते हैं क्योंकि जैसी जिसकी भावना होती है वह बाह्य परिधान भी वैसा ही ग्रहण करेगा। बिश्नोईयों को तो चाण्डालता से निवृतकरके देव तुल्य बनाया था इसीलिए सफेद या अन्यरंग नीले को छोड़कर पहनने की आज्ञा दी थी। क्योंकि वस्त्रों का प्रभाव भी मन बुद्धि शरीर
स्वभाव पर बहुत ज्यादा पड़ता है। सभी की अपनी-अपनी ड्रेस(परिधान) होता है। उससे समाज पर प्रभाव विशेष पड़ता है। सेना, वकील, जज, भक्त, साधु, संन्यासी इन्हीं की अपनी-अपनी पोषाकें हैं
जिससे भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। यदि आप नीले वस्त्र धारण करेंगे तो आपके अंदर चांडालता, राक्षस, दुष्टपना अवश्य ही आयेगा। और वही आप यदि भक्त, साधु, सज्जन पुरुष का सौम्य शुभ्र, पीत या लाल वर्ण के कपड़े पहनेंगे तो आपका प्रभाव भावनायें अति उत्तम होगी। इसीलिए राक्षसी परिधान त्याग करके भक्त का यह सफेद वस्त्र पहनना गुरु जी ने बतलाया था।
कुछ वैज्ञानिक लोग नीले वस्त्र में दोष बतलाते हुए कहते हैं कि यह हिन्दुस्तान गर्म देश है इसमे
गर्मी अधिक पड़ने का कारण सूर्य की किरणें यहां पर सीधी पड़ती हैं और वे किरणें नीले रंग की ओर आकर्षित ज्यादा ही होती हैं। सूर्य की किरणों से विपरीत रंग होता होता है जिससे सूर्य की किरणों को नीला वस्त्र खींचता है। जिससे गर्मी ज्यादा लगेगी। नीले वस्त्र से छनकर आयी हुई गर्मी स्वास्थ्य के लिए अति हानीकारक होती है तथा सफेद वस्त्र पर सूर्य की किरणें अपना प्रभाव नहीं डाल सकती वस्त्र पर पड़ते ही फिसल जाएगी शरीर तक अपना प्रभाव नहीं जमा पाएगी और यदि यत्किचिंत जमाती है तो भी शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक ही होती है। इसीलिए सफेद वस्त्र ही धारण करना चाहिए नील वस्त्र सभी दृष्टियों से हानीकारक सिद्ध हुआ है। नीले या काले वस्त्र में मेल गंदगी अपवित्रता का साम्राज्य होता है। क्योंकि वहआँखो से तो दिखाई नहीं पड़ता है सफेद वस्त्र में मेल छिपाने की गुंजाइश जरा भी नहीं होती।सफेद वस्त्रों से भक्त की पहचान होती है और नीले वस्त्रों से चाण्डाल दृष्टता की पहचान होती है। इसीलिए जम्भदेव जी ने जब बिश्नोई बनाए थे तब सभी के लिए यह नियम लागू करते हुए बताया था कि अब आप लोग भक्त सज्जन हो चुके हैं आपकी पहचान सफेद वस्त्रों द्वारा होगी। आप लोग हृदय की कालुष्यता त्याग चुके हैं तो अब
वस्त्रों की कालुष्यता भी त्याग दीजिए। यही नील वस्त्र त्याग रूपी नियम को बताने का उद्देश्य था और यह नियम सर्वथा शास्त्र सम्मत, वैज्ञानिकों की कसौटी पर खरा उतरने वाला है यदि इसके संबंध में संदेह होता है तो अवश्य ही विचार करके देखिए समाधान मिलेगा।

विशेष:- इस प्रकार से उन्नतीस नियमों की व्याख्या पूर्ण होती है तथा उन्नतीस नियमों के अंत में एक दोहा भी कहा है जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और बिश्नोई समाज में सर्वाधिक प्रचलित है:-

उन्नतीस धर्म की आखड़ी, हिरदै धरियो जोय।
जाम्भे जी किरपा करी, नाम बिश्नोई होय॥



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty eighteenth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज के 29 नियमों में अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   eighteenth rule of Bishnoi society. 

// मद्य मांस का सेवन न करना //

मद्य मांस का सेवन न करना। मनुष्य को कभी शराब नहीं पीना चाहिए। यदि जिसने भी शराब का सेवन कर लिया तो समझौ फिर उसने मांस भी खा लिया इसलिए मद्य मांस दोनों को एक ही नियम के अंतर्गत रखे गए हैं। इन दोनों में से एक कर्म कर लिया तो फिर दूसरा भी करने में कोई संकोच नहीं होगा। शराब पीने में अनेक अवगुण शास्त्रकारों ने तथा महापुरुषों ने बताए है- चित्ते भ्रान्तिजयिते मद्यपानाद् भ्रांते चित्ते पाप चय्-र्यमुपैति । पापं कृत्वा दुर्गतिं यान्ति,मिढास्तस्मान्मद्यं नैवपेयं नैव पेयम्।।रत्नाकर।। मद्यपान करने से चित्त में भ्रांति उत्पन्न हो जाती है तथा भ्रांत चित्त से पाप कर्म ही हो सकते हैं और पापों को करके तो दुर्गति को प्राप्त होता है इसलिए हे मूढ़ ! मद्यपान न करो, न करो। यही सलाह जम्भेश्वर भगवान ने दी थी। क्योंकि सभी अनर्थों का मूल यह शराब ही है। इस अनर्थ के पीछे सभी पाप, अनर्थ चले आते हैं। ऐसा हम लोग व्यवहार में देखते भी हैं। तथा च मद्यपान के और भी अवगुण है। द्यूतं च मांसं च सुरा च वैश्या, पापादि चौर्य परदार सेवा। एतानि सप्त व्यसनानि लोके, पापाधिके पुन्सि सदा भवन्ति ।। सुरापान करने से अन्य व्यसन जैसे जुआ खेलना, मांस खाना, वैश्या गमन करना, चोरी करना, परस्त्री की सेवा करना तथा पापों की अधिकता हो जाना इत्यादि होते हैं। जो मानव को पतित कर देते है। इसलिए मानवता की रक्षा के लिए व्यसनों के मूलरूप शराब को ही काट डालना चाहिए। यदि इस मूल को पानी सिंचते रहे तो फिर कभी भी मानव व्यसनों से छुट्टी पा सकेगा। अपना तथा अपने संबंधियों का जीवन बरबाद कर डालेगा। शराब पीने के पश्चात मनुष्य सुध-बुद्ध खो बैठता है। उसे किसी प्रकार की मर्यादा का भानही नहीं रहता है ऐसे समय में वह कुछ भी कुकर्मकर सकता है। ऐसी कामना करने से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब तक जो भी भयंकर अनर्थ हुए हैंवे सभी इसी मद्यपान के बदौलत ही हुए हैं, सभी झगड़े झंझटों का मूल यह गंदा पानी ही है। इसीलिए ऐसा विचार करके इसका त्याग करें तथा करवायें इस जीवन को स्वर्गमय बनाए तथा बनवायें इससे बढ़कर और कोई जीवन का लाभ नहीं होगा। मांस नहीं खाना इसकी व्याख्या तो जीव दया पालणी के अंतर्गत ही हो गई है पुनः व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं हैं।


साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का सताईसवां नियम (भांग) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty seven rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का सताईसवां  नियम (भांग) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   seven rule of Bishnoi society. 


भांग कदापि नहीं पीना चाहिए। भांग भी एक प्रकार का जहर है। शरीर को धीरे-धीरे काटता है। भांग पीने वाले को तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ कि मोटा हो रहा हूँ। किन्तु वास्तविकता से वह बहुत दूर होता है। शिवजी का नाम लेकर साधना भजन करने वाले
भी भांग को पवित्र मानकर पीते हैं। वहाँ पर नाम साधना कालेते हैं और भांग के नशे में धुत रहते हैं। इसी प्रकार से अपने जीवन को बरबाद करते देखे गए हैं। जीवन की वास्तविकता को नशा थोड़ी देर के लिए भूला सकता हैं जिसका यह तात्पर्य तो नहीं होता कि आप सदा के लिए ही दुःखों से छूट गए हैं। शिवजी की बराबरी करना तो ढोंग मात्र ही है। केवल तम्बाकू भांग से
शिवजी नहीं बना जा सकता। उसके लिए शिव जैसी तपस्या करनी होगी। भांग पीने वाले अर्ध विक्षिप्त तो होते ही हैं कभी-कभी उन पर अधिक भांग सेवन से पूर्णतया पागलपन आ जाता है। ऐसे समय में जीवनसे भी हाथ धो बैठते हैं। "भांग भखंत ध्यान ज्ञान खोवंत, यम दरबार ते प्राण रोवन्त" गोरखवाणी" भांग पीने से ज्ञान ध्यान, नष्ट हो जाते हैं तथा इस जीवन में दुःख उठाते हुए मृत्यु पर यमराज के दूतोंद्वारा मार पड़ने पर फिर प्राण रोयेंगे। इसलिए कभी भी भांग
नहीं पिनी चाहिए।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty sixth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty  sixth rule of Bishnoi society. 


खाने पीने सूंघने के रूप में तम्बाकू का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी भयंकर हानीकारक वस्तु को गधे भी नहीं खाते किन्तु वाह रे मानव ! तूने इसका कई प्रकार से प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया है। आज तक तो इतिहास साक्षी है कि कोईभी तम्बाकू का सेवन करने वाला न तो स्वयं सुख शांति को प्राप्त हुआ है और न ही अपने पड़ोसी को सुख शांतिपूर्वक रहने दिया है। सर्वप्रथमतो तम्बाकू से अपने मन बुद्धि तथा शरीर को स्वयं कमजोर करता है और बाद में तम्बाकू की दुर्गंध से समीपस्त जनों को भी दूषित कर देताहै। प्राचीनकाल में तो गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इस महान कोढ से अवगत करवाकर सदा ही इससे अपनी रक्षा करने का उपाय बतलाया था। सभी को पाहल देकर प्रतिज्ञा करवायी थी। धीरे-धीरे समय पाकर आज इसने पुनः भयंकर रूप धारण कर लिया है। इससे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक, डॉक्टर,मनीषी बहुत ही चिंतित हो चुके हैं। नयी-नयी कानूनें बनवातेहैं, चेतावनी देते हैं, कि यह नशा ही मानवता की मौत का = संदेश है। इसीप्रकार यदि सभी लोग इस नशे के चक्कर में पड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जिस दिन मानवता नष्ट हो जाएगी। ये बने हुए एटम बम तो न जाने कब टूटेगे। इससे पहले ही यह तम्बाकू आदि का नशा मानवता को नष्ट कर देगा। इसलिए आजकल कई देशों में सामूहिक रूप से लोग नशे को छोड़ रहे हैं। ऐसा ही दुःख जाहिर किसी विद्वान ने किया है। उन्हीं के शब्दों में- "तम्बाकू और इंसान दोनों एक दूसरे को खाते हैं" बस यों ही खाया था मीठा पान और अब ? अब तो तम्बाकू सिगरेट की आदत छूटती ही नहीं। लेकिन मात्र लाचारी जाहिर करने से इस सच

को झूठलाया नहीं जा सकता कि स्वाद के नाम पर लिया गया तम्बाकू या तनाव घटाने के बहाने पी गयी सिगरेट के हर पैकेट के साथ आप जिंदगी को उस चौराहे की ओर ढकेल देते हैं, जहाँ से हर रास्ता आपको मौत के करीबले जाता है।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी