अजर जरै : ( काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ को वश में रखना) | 29 Rules of Bishnoi

अजर जरै : ( काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ को वश में रखना) | 29 Rules of Bishnoi


बिश्नोई समाज का इकीसवां नियम (अजर जरै) भावार्थ सहित 

अजर जो काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अहंकार आदि अब तक जले नहीं हैं इनको राख न होकर अग्नि रूप में स्थित होकर मानव को जलाते रहते हैं। इनको जला दिया जाय इनकी भस्मी ठंडी हो जायेगी तभी तुम्हें चैन पड़ेगा। अर्थात् इन्हें वस में करें।

यदि इनको जलाकर भस्मभूत नहीं किया तो ये मानव को सदा ही जलाते रहेंगे। कभी कामनायें जलाएगी तो उन्हीं कामनाओं से क्रोधरूपी अग्नि का विस्तार होगा और क्रोध अपना प्रसार करेगा तो लोभ पैदा हो जाएगा तथा लोभ से मोह उत्पन्न हो जाता है।  मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और मोहित लोग सदा अहंकार करेगा अपने सदृश्य किसी अन्य को नहीं समझेगा तो नष्टता को प्राप्त हो जाएगा, इसलिए ये काम क्रोधादि कहीं आग लगा न दे उससे पहले ही सचेत होकर इनको ही ठंडा करना उचित होगा।

जब तुम्हारे अहंकार की निवृत्ति हो जाएगी तो जीते जी मरे हुए के समान हो जाओगे ।।जीवत मरो रे जीवत मरो जिन जीवन की विधि जाणी।। जे कोई आवै हो हो करता आपज हुईये पांणी।। शब्दवाणी - जरणा यानी सहन शीलता ही जरणा है और जो जरणा रखता है वह जीते जी मृत के समान हो जाता है उसके लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं है।

सम्पूर्ण कण-कण में एक परमात्मा की ज्योति का दर्शन करता हुआ परम पद को प्राप्त कर लेता है। जीते जी तो जीवनमुक्त होकर जीता है। अपार स्वर्ग सुख को प्राप्त करता है और मृत्यु पर भी मोक्ष को प्राप्त करता है। उसके लिए जीवन-मरण का कोई विशेष अर्थ नहीं होता, दोनों बराबर ही होते हैं। उसके बंधन कारक काम क्रोधादि जल जाने सेबंधनों की रस्सी टूट जाती है। निर्मुक्त हो जाने से फिर वह कभी दुःख में नहीं गिरता जब तकबंधन की पाश में फँसा रहता है तभी तक दुःख रहता है। 
"रतन काया बैकुण्ठे वासो तेरा जरा मरण भय भाजूं"

 (शब्दवाणी)

बूढ़ापे तथा मृत्यु का भय ही अधिक कष्टदायक है वह ज्ञानी का नष्ट हो जाता है। इसलिए सभी को जरणा सहनशीलता रखनी चाहिए। सदा नम्रता से व्यवहारकरना ही मानवता की सफलता है।


साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 


रसोई अपने हाथ से बनावें : 29 नियम बिश्नोई

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